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सोयाबीन, उड़द एवं मक्का में कीट-रोग नियंत्रण के लिए कृषि वैज्ञानिकों की सामयिक सलाह

खरीफ सीजन की फसलों में कीट एवं रोगों के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों के लिए सोयाबीन, उड़द और मक्का की फसल में समय रहते निगरानी और नियंत्रण की सलाह जारी की है। वैज्ञानिकों का कहना है कि खेतों का नियमित निरीक्षण कर शुरुआती अवस्था में ही कीट-रोग की पहचान करने से फसल को होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

सोयाबीन में निगरानी जरूरी

कृषि वैज्ञानिकों ने सोयाबीन की फसल में पत्ती खाने वाले कीट, तना एवं फलियों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों पर विशेष निगरानी रखने की सलाह दी है। खेत में पौधों की पत्तियों, तने और फलियों की नियमित जांच करने को कहा गया है।

कीटों का प्रकोप दिखाई देने पर कृषि विभाग अथवा कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार ही अनुशंसित कीटनाशक का प्रयोग करने की सलाह दी गई है। अनावश्यक रूप से रसायनों के छिड़काव से बचने पर भी जोर दिया गया है।

उड़द में रोगग्रस्त पौधों पर रखें नजर

उड़द की फसल में पत्ती एवं फली को प्रभावित करने वाले कीटों के साथ रोगों की पहचान के लिए नियमित खेत निरीक्षण जरूरी बताया गया है। वैज्ञानिकों ने किसानों से कहा है कि रोगग्रस्त पौधों अथवा असामान्य लक्षण दिखाई देने पर तुरंत कृषि विशेषज्ञों से सलाह लें।

साथ ही खेत में जलभराव की स्थिति न बनने देने और खरपतवार नियंत्रण पर भी ध्यान देने को कहा गया है।

मक्का में तना एवं पत्ती को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों से सावधानी

मक्का की फसल में भी कीटों के प्रकोप को लेकर किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है। पौधों की पत्तियों और तने की नियमित जांच करने तथा शुरुआती लक्षण मिलते ही नियंत्रण उपाय अपनाने को कहा गया है।

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि कीटनाशकों का इस्तेमाल फसल, कीट की अवस्था और प्रकोप की तीव्रता के आधार पर कृषि विशेषज्ञों की अनुशंसा के अनुसार किया जाना चाहिए।

मौसम के अनुसार करें फसल प्रबंधन

कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को मौसम में होने वाले बदलावों के अनुसार खेत की निगरानी बढ़ाने की सलाह दी है। वैज्ञानिकों के मुताबिक समय पर कीट-रोग की पहचान, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, उचित सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण से फसल को स्वस्थ रखने में मदद मिल सकती है।

किसानों से अपील की गई है कि किसी भी कीट या रोग की पुष्टि किए बिना दवा का छिड़काव न करें और स्थानीय कृषि विभाग या कृषि वैज्ञानिकों से सलाह लेकर ही अनुशंसित दवाओं का प्रयोग करें।

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