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सीट का समीकरण: सहसवान में BJP-BSP को अब तक जीत का इंतजार, मुलायम सिंह यादव भी रह चुके हैं विधायक

बदायूं। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। राजनीतिक दल संगठन को मजबूत करने और मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बढ़ाने में जुटे हैं। इसी चुनावी माहौल के बीच बदायूं जिले की सहसवान विधानसभा सीट का सियासी इतिहास भी चर्चा में है। यह सीट लंबे समय से समाजवादी राजनीति का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है।

सहसवान की खास बात यह है कि यहां भारतीय जनता पार्टी (BJP) और बहुजन समाज पार्टी (BSP) अब तक विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज नहीं कर सकी हैं। वहीं कांग्रेस को भी इस सीट पर केवल एक बार सफलता मिली है। समाजवादी पार्टी (SP) के संस्थापक मुलायम सिंह यादव भी वर्ष 1996 में सहसवान से विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं।

1957 में पहली बार हुआ विधानसभा चुनाव

सहसवान विधानसभा सीट परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई और यहां पहला विधानसभा चुनाव 1957 में हुआ था। इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार उल्फत सिंह ने जीत दर्ज कर विधानसभा में प्रवेश किया था।

इसके बाद सीट की राजनीति में अलग-अलग दलों और प्रत्याशियों का प्रभाव देखने को मिला, लेकिन समय के साथ सहसवान समाजवादी राजनीति का मजबूत केंद्र बनती चली गई।

सपा के गढ़ के रूप में बनी पहचान

सहसवान विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास समाजवादी पार्टी से खास तौर पर जुड़ा रहा है। वर्ष 1996 में मुलायम सिंह यादव ने यहां से चुनाव जीतकर इस सीट को प्रदेश की चर्चित विधानसभा सीटों में शामिल कर दिया।

मुलायम सिंह यादव की जीत ने सहसवान की राजनीतिक पहचान को और मजबूत किया। इसके बाद भी समाजवादी खेमे का इस सीट पर प्रभाव बना रहा।

BJP और BSP के सामने बड़ी चुनौती

सहसवान में भाजपा और बसपा अभी तक अपना खाता नहीं खोल सकी हैं। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के सामने इस सीट पर अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने की चुनौती होगी।

भाजपा के लिए जहां प्रदेश की सत्ता में अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा, वहीं विपक्षी दल भी इस पारंपरिक राजनीतिक समीकरण को अपने पक्ष में बनाए रखने की कोशिश करेंगे।

2027 में बदल सकता है सियासी समीकरण

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में सहसवान सीट पर भी पुराने राजनीतिक समीकरणों और नए सामाजिक-राजनीतिक बदलावों के बीच मुकाबला दिलचस्प होने की उम्मीद है।

आने वाले चुनाव में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सहसवान का समाजवादी गढ़ बरकरार रहता है या भाजपा और बसपा जैसे दल यहां पहली बार जीत दर्ज कर इतिहास बदलने में कामयाब होते हैं।

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