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हिमालय में क्यों टूटा ग्लेशियर? नेपाल की विनाशकारी बाढ़ की असली वजह आई सामने

लखनऊ/काठमांडू। नेपाल में पिछले दिनों आई विनाशकारी बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। नेपाल सरकार के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक, बाढ़ और उससे जुड़ी घटनाओं में अब तक 987 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 3,916 लोग अभी भी लापता हैं। प्रभावित इलाकों में राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है।

इस आपदा ने विशेषज्ञों के सामने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर इतनी भयावह बाढ़ इतनी तेजी से कैसे आई और स्थानीय लोगों को समय रहते पर्याप्त चेतावनी क्यों नहीं मिल सकी।

बारिश नहीं हो रही थी, फिर कैसे आई इतनी बड़ी बाढ़?

इस आपदा की सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि बाढ़ के समय प्रभावित क्षेत्र में सामान्य बारिश नहीं हो रही थी। शुरुआती जांच और सैटेलाइट तस्वीरों से संकेत मिला है कि आपदा की शुरुआत हिमालय में ग्लेशियर के एक बड़े हिस्से के अचानक टूटने से हुई।

विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन-नेपाल सीमा के पास ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर और चट्टानों का बड़ा हिस्सा अचानक नीचे की ओर खिसका। इसके साथ बर्फ, चट्टान, मिट्टी और मलबे का विशाल सैलाब नीचे की नदी घाटियों की ओर बढ़ा।

ग्लेशियर टूटने के बाद बना पानी और मलबे का सैलाब

सैटेलाइट विश्लेषण के अनुसार, करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर लगभग 1,200 मीटर नीचे गिरा। इस दौरान भारी मात्रा में चट्टान और मलबा भी साथ आया।

यह मलबा ल्हेंडे नदी में पहुंचा और कुछ समय के लिए नदी के प्रवाह को रोककर प्राकृतिक बांध जैसी स्थिति बन गई। इसके बाद जब यह अवरोध टूटा तो पानी और मलबे का बेहद शक्तिशाली प्रवाह नीचे की ओर बढ़ा और नेपाल की नदी घाटियों में भारी तबाही मच गई।

इसका असर भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र तक पहुंचा। त्रिशूली नदी का जलस्तर कुछ ही समय में कई मीटर बढ़ गया, जिससे निचले इलाकों में अचानक बाढ़ की स्थिति पैदा हो गई।

भूकंप नहीं था ग्लेशियर टूटने की वजह

शुरुआत में इस घटना के दौरान दर्ज भूकंपीय संकेत को संभावित भूकंप से जोड़कर देखा गया था। हालांकि, बाद के विश्लेषण में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) ने संकेत दिया कि यह कंपन किसी भूकंप के कारण नहीं, बल्कि भूस्खलन और ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने से पैदा हुआ था। इस घटना का भूकंपीय सिग्नल करीब 5.2 तीव्रता के बराबर दर्ज हुआ।

आखिर ग्लेशियर क्यों टूटा?

विशेषज्ञों ने ग्लेशियर के टूटने के पीछे कई संभावित कारणों की ओर इशारा किया है। इनमें बढ़ता तापमान, ग्लेशियरों का पीछे हटना और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जमी बर्फ तथा जमीन के अस्थिर होने जैसी परिस्थितियां शामिल हैं।

सैटेलाइट तस्वीरों में ग्लेशियर क्षेत्र में तेजी से बर्फ पिघलने के संकेत भी मिले हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय में तापमान बढ़ने के साथ ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ऐसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि, किसी एक घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन के कारण बताने के लिए अभी और वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है।

समय रहते अलर्ट क्यों नहीं मिला?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि घटना अचानक हुई और उस समय भारी बारिश नहीं हो रही थी। सामान्य बाढ़ चेतावनी प्रणालियां अक्सर बारिश और नदी के जलस्तर में बदलाव जैसे संकेतों पर निर्भर करती हैं। लेकिन ग्लेशियर टूटने, भूस्खलन और अचानक प्राकृतिक बांध टूटने जैसी घटनाओं में चेतावनी के लिए अलग तरह की निगरानी और सेंसर नेटवर्क की जरूरत होती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ग्लेशियर, ग्लेशियल झीलों, भूस्खलन और नदी घाटियों की रियल-टाइम निगरानी को मजबूत करना बेहद जरूरी है।

अब भी जारी है राहत और बचाव अभियान

नेपाल में राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है। अधिकारियों के मुताबिक हजारों लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है, जबकि दूरदराज के इलाकों और जलविद्युत परियोजनाओं में फंसे लोगों तक पहुंचने के लिए हेलीकॉप्टर, अस्थायी पुलों और अन्य साधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

यह आपदा सिर्फ नेपाल के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी मानी जा रही है। तेजी से बदलते मौसम, ग्लेशियरों की अस्थिरता और पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ते बुनियादी ढांचे के बीच भविष्य में ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए बेहतर पूर्व चेतावनी और आपदा प्रबंधन व्यवस्था की जरूरत और बढ़ गई है।

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